पृष्ठभूमि


          डा० हरिमोहन गुप्त की साहित्य में रुचि छात्र जीवन से ही रही,पर चिकित्सा कार्य में साहित्य से सम्बन्धित कार्यों के लिये समय निकालना कठिन होता है, पर फिर भी वे समय निकाल कर साल में दो चार कविताएँ, कुछ मुक्तक लिख ही लेते थे | सन 1992 में जब वे अपने घरेलू दायित्व से मुक्त हुये और उनके ज्येष्ठ पुत्र डा० हर्षबर्धन गुप्त चिकित्सा कार्य में सहयोग करने लगे तो साहित्यक कार्यों के लिये समय निकालना आसान हो गया, तभी मन में आया कि कोंच में “हिन्दी साहित्य सम्बर्धन संस्थान” की स्थापना की जाये, इसमें सहयोग देने और मुख्य भूमिका निभाने में स्व० श्री ठाकुरदास जी वेद जो उस समय “मथुरा प्रसाद स्नातकोत्तर महा विद्यालय” के प्राचार्य थे जुड़ गये और 3 दिसम्बर 1992 को” हिन्दी साहित्य सम्बर्धन संस्थान” प्रकाश में आया |
              प्रारम्भ में साहित्यक गोष्ठियाँ से प्रारम्भ कर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष और कई महा विद्यालयों के आचार्य गण समय समय पर अपना समय देते रहे | 4  जनवरी सन 1999  को डाक्टर साहब के पूज्य पिताजी श्री विश्वनाथ जी गुप्त जो अच्छे साहित्यकार और कवि थे उनकी आकस्मिक मृत्यु होने पर संस्था ने निर्णय लिया कि प्रतिवर्ष 4 जनवरी को विशाल कवि सम्मेलन का  आयोजन हो जिसमें जिसमे जनपद जालौन के एक साहित्यकार का सम्मान किया जाये एवं मथुरा प्रसाद महा विद्यालय में एम० ए०हिन्दी विषय में सर्वाधिक अंक लाने वाले छात्र को सम्मानित किया जाये |
                 यह कार्य तबसे निरन्तर चल है | समय समय पर साहित्यक गोष्ठी होती हैं, विद्वानों को बुला कर उनका सम्मान होता है |

Comments

Popular Posts